सीपी ने इलाहाबाद में मेरी किताब पर चर्चा के लिए जो इन्तजाम किया था उसका प्रभाव अगले दिन की अखबारी रिपोर्टो को देखकर बखूबी किया जा सकता है। सी.पी. यानि चन्द्र प्रकाश, इलाहाबाद के डी.आई.जी. जो जिले के पुलिस प्रमुख हैं और मेरे मित्र है। हमारा बैच एक ही है। यह एक सुखद संयोग ही है कि एक जमाने में मैं इलाहाबाद में ट्रेनिंग के लिए तैनात था और सी.पी. लखनऊ में थे। तब मैने इन्हें कुम्भमेला घूमने के लिए बुलाया था। आज ये इलाहाबाद के पुलिस कप्तान हैं और मुझे इनके सौजन्य से इस गौरवशाली शहर में अपनी पुस्तक पर परिचर्चा के साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर मिला। श्री विभूति नारायण राय जी उस समय इलाहाबाद के एस.एस.पी. हुआ करते थे। इन्होंने तब मुझे ट्रेनिंग दी थी, और आज एक विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में मेरी पुस्तक पर परिचर्चा के इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बने।
इस परिचर्चा की खबरें स्थानीय अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित कीं। प्रस्तुत है इलाहाबाद से प्रकाशित समाचारों का संकलन। समाचारों को अविकल पढ़ने के लिए उन चित्रों पर क्लिक करिए।
आशा है आप सबको यह प्रस्तुति पसन्द आएगी।
(अशोक कुमार)
nice
जवाब देंहटाएंअशोक जी,
जवाब देंहटाएंयह सही है कि पुलिस में सभी इंसान होते हैं। पुलिस राज्य का औजार है। जैसे जैसे राज्य के स्वरूप में परिवर्तन होता जाएगा पुलिस का स्वरूप भी परिवर्तित होगा। जनतंत्र में पुलिस के मानवीय स्वरूप के विकास की बहुत संभावनाएँ हैं। लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि राज्य उसे इस के विकास की कितनी छूट देता है।
इस आयोजन की सूचना विवरण से बहुत प्रसन्नता हुई। आनंद वर्धन शुक्ल के कोटा पदस्थापित रहने के दौरान उन से परिचय का अवसर मिला था। निश्चित रूप से वे पुलिस की वर्दी में इंसान ही नहीं थे। एक सास्कृतिक उन्नयन के आकांक्षी व्यक्ति भी हैं।
बढ़िया मीडिया मैनेजमेंट !
जवाब देंहटाएंआपको पुस्तक विमोचन की बधाई !!