समर्पित

इन्सानियत की सेवा करने वाले खाकी पहने पुलिस कर्मियों को जिनके साथ कार्य कर मैं इस पुस्तक को लिख पाया और
माँ को, जिन्होंने मुझे जिन्दगी की शुरुआत से ही असहाय लोगों की सहायता करने की सीख दी

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

इलाहाबाद में ट्रेनिंग के शुरुआती अनुभव आँखें खोलने वाले थे…

 

चक्रव्यूह

राष्ट्रीय पुलिस अकादमी, हैदराबाद से ट्रेनिंग पूरी करने के बाद मेरी पहली पोस्टिंग सहायक पुलिस अधीक्षक प्रशिक्षणाधीन के रूप में इलाहाबाद में हुई।

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संगम नगरी इलाहाबाद को प्रयागराज के नाम से भी जाना जाता है। दो नदियों का संगम तो कई दूसरे प्रयागों में भी होता है जैसे देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग आदि। किन्तु इलाहाबाद तीन नदियों गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर बसा हुआ शहर है, इसीलिए इसे प्रयागों का राजा प्रयागराज कहा जाता है। सरस्वती नदी का उल्लेख पुराणों में तो है किन्तु बाद में यह नदी विलुप्त हो गई। इलाहाबाद को कुम्भनगरी के रूप में भी जाना जाता है। बारह वर्ष में एक बार लगने वाला महाकुम्भ इलाहाबाद, हरिद्वार, उज्जैन एवं नासिक में हर तीन वर्षों के अन्तराल पर लगता है। इन सब में इलाहाबाद में लगने वाले महाकुम्भ का अलग ही महत्व है।

धार्मिक नगरी के अतिरिक्त इलाहाबाद शिक्षा और साहित्य के केन्द्र के रूप में भी विख्यात रहा है। यहाँ पर गंगानाथ झा, फिराक गोरखपुरी, महादेवी वर्मा, हरिवंशराय बच्चन, धर्मवीर भारती आदि शिक्षकों का आभामंडल हमेशा मौजूद रहा है। दूर-दूर से लोग यहाँ पर अध्ययन करने के लिए आते रहे हैं। इलाहाबाद सांस्कृतिक रूप से भी शास्त्रीय गायन, लोक गायन, शास्त्रीय नृत्य एवं लोक नृत्य की समृद्ध परम्पराओं का गढ़ रहा है। राजनीतिक रूप से भी इलाहाबाद आजादी के पूर्व के दिनों से ही देश की राजनीति के केन्द्र में रहा है। मोतीलाल नेहरू का आवास ‘आनन्द भवन’ आजादी की लड़ाई में कांग्रेस के मुख्यालय के रूप में प्रसिद्ध रहा है और स्वतंत्राता के बाद भी जवाहर लाल नेहरू से लेकर वी. पी. सिंह तक कई प्रधानमंत्री या तो इलाहाबाद के रहने वाले थे या वहाँ पर शिक्षा ग्रहण किए हुए थे। चन्द्रशेखर आजाद ने यहीं पर देश की आजादी के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की कुर्बानी दे दी थी।

सामाजिक और राजनैतिक दृष्टि से नब्बे के दशक के शुरुआती वर्ष काफी उथल-पुथल भरे थे। एक तरफ मण्डल कमीशन, दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद... दोनों मुद्दों ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। चारों तरफ आन्दोलन ही आन्दोलन नज़र आते थे। ऐसी सामाजिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों में मैंने अपने पुलिस कैरियर की शुरुआत की। सबसे पहले हम लोगों को एस.एस.पी. कार्यालय से सम्बद्ध किया गया।

ट्रेनिंग के दौरान के अपने पुराने अनुभवों की अपेक्षा जो बात यहाँ सबसे अलग देखने में आयी, वो थी लोगों का लगातार शिकायतें लेकर आना और अपनी शिकायतों का निस्तारण ढूँढना। औसतन सौ से दो सौ आदमी इलाहाबाद पुलिस कार्यालय में प्रतिदिन अपनी समस्याएं लेकर आते थे। कुछ लोग नेताओं के साथ आते थे तो कुछ लोग वकीलों को साथ लेकर। निश्चय ही कुछ लोग ऐसे भी होते थे जो दरख्वास्त लेकर बिना किसी सहारे के आते थे। इन शिकायतों को ध्यान से देखने पर मुख्य रूप से जो बातें सामने आई वे थीं- किसी का मुकदमा नहीं लिखा जाना, किसी पर हमला हो जाने पर पुलिस को शिकायत करने पर भी पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करना, किसी के खिलाफ झूठा मुकदमा लिखा जाना, किसी को किसी मुकदमे में झूठा फँसा दिया जाना, किसी का मुकदमा लिखे जाने के बावजूद भी अपराधियों की गिरफ़्तारी न होना आदि-आदि। कुल मिलाकर ये शिकायतें या तो थानाध्यक्ष, चौकी इंचार्ज या हल्का प्रभारी द्वारा दिखाई गई पुलिस की निष्क्रियता सम्बन्धी होतीं या फिर पुलिस द्वारा की जाने वाली गलत कार्यवाही की।

इलाहाबाद बहुत बड़ा जनपद था जिसमें उस समय 44 थाने एवं 14 सर्किल थे। एक इतने बड़े जिले में जहाँ अधिकारियों को कानून-व्यवस्था की समस्याएं ही दिन भर सुलझानी होती हैं, उनके पास इतनी बड़ी संख्या में आने वाली शिकायतों को सुनने, उनकी गहराई तक जाने अथवा सुलझाने के लिए पर्याप्त समय निकाल पाना सम्भव नहीं हो पाता। अतः ये शिकायतें अधीनस्थ अधिकारियों को, जिनमें अपर पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी और थाना प्रभारी मुख्य रूप से होते थे, कार्यवाही हेतु प्रेषित कर दी जाती थीं। क्षेत्राधिकारी पुलिस विभाग में सबसे निचले दर्जे का राजपत्रित अधिकारी होता है। आम तौर पर थाना पुलिस के खिलाफ शिकायत वाले प्रार्थना पत्रों को जाँच करने हेतु क्षेत्राधिकारी को भेज दिया जाता था। परन्तु आश्चर्यजनक बात जिसने मेरा ध्यान आकृष्ट किया, वह यह थी कि क्षेत्राधिकारी द्वारा जांच खुद न करके जिस थाने के खिलाफ वह शिकायत होती थी, उसी थानाध्यक्ष को प्रार्थना पत्रों को जांच हेतु भेज दिया जाता था। थाने द्वारा जो जांच आख्या क्षेत्राधिकारी के माध्यम से भेजी जाती थी, उसमें अन्ततः पुलिस की पूर्व कहानी का ही उल्लेख होता था और शिकायतकर्ता की शिकायतों को झूठा या पेशबन्दी में दिया जाना बताकर जांच आख्या एस.एस.पी. कार्यालय तक आ जाती थी।

शिकायतों की ढेरों जांच फाइलों की गहराई में जाने का समय किसी के पास नहीं होता था और जांच आख्याओं के ये ढेर अंततः ‘सीन, फाइल’ नोट के साथ दबा दिये जाते थे।

लगभग एक माह तक कार्यालय में बैठने के बाद मैंने यही पाया कि बेचारे शिकायतकर्ता इधर से उधर मारे-मारे फिरते हैं और उनकी शिकायतों को ध्यान से नहीं सुना जाता है। दो ही स्थितियों में कार्यवाही होती- या तो कोई प्रभावशाली व्यक्ति बहुत ज्यादा जोर देकर अपनी बात को बार-बार कहता अथवा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा किसी शिकायत पर विशेष रूप से ध्यान दिये जाने के लिए कहा गया होता। अन्यथा शिकायत फाइलों के ढेर में दब कर रह जाती थी। इसके बावजूद शिकायतों को लेकर आने का लोगों का सिलसिला जारी रहता था। इसे गरीब जनता की नियति कहिए या न्याय पाने की उम्मीद। देखने में यह भी आता था कि महीना दो महीना चक्कर काटने के बाद परेशान होकर वे लोग इसे अपने भाग्य की नियति मानकर चुप बैठ जाते थे।

शिकायतों के निस्तारण का यह तरीका मुझे बिल्कुल भी न्यायसंगत नहीं लगा था। कुछ समय बाद मुझे थानाध्यक्ष की ट्रेनिंग हेतु फूलपुर पुलिस स्टेशन भेजा गया, जो इलाहाबाद से लगभग तीस किलोमीटर दूरी पर स्थित एक मंझले आकार का तहसील मुख्यालय है। आजादी के बाद फूलपुर में इफ़को जैसी एक-दो बड़ी फैक्ट्रियाँ लगाई गई थीं, इसके अलावा यह थाना पूरी तरह से ग्रामीण अंचल वाला था।

‘शहर में कर्फ़्यू’ जैसे उपन्यास के सुप्रसिद्ध लेखक विभूति नारायण राय मेरे पहले वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे। पुलिस की सेवा करते हुए एक बेहतर इंसान बने रहने और अपनी मनुष्यता को बनाए रखने के मेरे आदर्शों को उनसे बराबर बल मिलता रहा। उन्होंने मुझे थानाध्यक्ष की ट्रेनिंग में जाने से पहले यह सीख दी थी कि वहाँ नीचे के स्तर तक जाकर सीखना है और मुंशी के बस्ते पर भी बैठकर सीखना है। उन्होंने कहा था कि यदि अधिकारी बनकर तने रहोगे तो जिन्दगी भर कुछ नहीं सीख पाओगे। मैंने उनकी बात गाँठ बाँध ली थी। थाना फूलपुर में प्रारम्भ के चार-पाँच दिन मेरे लिए अत्यन्त हैरानी भरे रहे क्योंकि उन दिनों सुबह से शाम तक मैं थाने में बैठा रहता लेकिन कोई मुझसे मिलने नहीं आता था। मैंने सोचा, या तो यहाँ अपराध बहुत कम है, अथवा हैं ही नहीं! या फिर लोगों में आपसी झगड़े नहीं होते अथवा लोगों के मन में खाकी वर्दी पर से विश्वास उठ गया है और वे लोग थाने ही नहीं आते। मैंने यह भी सोचा कि हो सकता है कि यहाँ के लोगों में पुलिस का भय अत्यधिक व्याप्त हो और वे यहाँ कदम रखने में ही घबराते हों।

पांचवें दिन जब मैं पूरा दिन खाली बिताकर वापस लौट रहा था तो थाने के बाहर करीब पचास कदम की दूरी पर स्थित चाय की दुकान पर मुझे काफी भीड़ दिखाई दी। मैंने उत्सुकतावश वहाँ पर अपनी जीप रोकी और नीचे उतर कर एक वृद्ध आदमी से जानना चाहा कि यहाँ पर लोग क्यों इकट्ठे हैं? वृद्ध ने बताया कि वह थाने पर शिकायत लेकर आए हैं। वृद्ध ने आगे बताया कि इंस्पेक्टर साहब ने उनसे कहा है कि जब तक अन्दर ‘आईपीएस साहब’ बैठे हैं, तब तक कोई इधर न आए और तब तक सब लोग चाय की दुकान पर ही रुकें। ‘साहब जब थाने से चले जाएँगे, उसके बाद ही लोग थाने पर जाएँगे।’ मैं आश्चर्य के साथ उस व्यक्ति को देखता रह गया। अब जाकर मामला मेरी समझ में आया कि क्यों मेरे पास पिछले पाँच दिनों से कोई मिलने नहीं आया था।

मैंने इंसपेक्टर को बुलवाया और पूछा कि ऐसा उसने क्यों किया, तो उसका दो टूक जबाब था,

‘‘अरे साहब, आप तो राजा आदमी हैं। आई.पी.एस. अफसर को तो राजा की तरह ही रहना चाहिए। ये सब छोटे-मोटे काम तो हम लोगों पर ही छोड़ देने चाहिए।’’

उसने आगे कहा, ‘‘साहब, इनको यहाँ आकर मिलने से कुछ नहीं होने वाला है। ये लोग तो ऐसे ही आते रहते हैं। इनकी सुनेंगे तो आप भी परेशान हो जाएँगे। इनका तो धन्धा ही है खुद परेशान होना और दूसरों को परेशान करना।’’ उसने साथ में एक भद्दी-सी गाली भी ठोकी।

ऐसा नहीं था कि ऐसा पहली बार इसी इंसपेक्टर द्वारा किया गया हो। आम तौर पर कई अधिकारी इसी तरह अपनी ट्रेनिंग बिता देते हैं और अधीनस्थ अधिकारी ‘राजा साहब’ कहकर उनको चने के झाड़ पर चढ़ाये रखते हैं और अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। कुछ ही अधिकारी होते हैं जो नीचे तक अपनी पकड़ बना पाते हैं, ऐसे अधिकारियों को स्टाफ द्वारा ‘कड़क’ या ‘सख्त’ अधिकारी की संज्ञा दी जाती है। ‘राजा साहब’ की श्रेणी वाले अधिकारियों के कार्यकाल में नीचे का स्टाफ ज्यादा खुश रहता है, क्योंकि ऐसे अधिकारी न तो क्षेत्रा में जाते हैं, न अपराध की गहराई में जाते हैं और न ही अधीनस्थ अधिकारियों द्वारा किए गए गलत कार्यों की तह तक जाते हैं। ऐसे अधिकारी वास्तविकता से पूरी तरह बेखबर रहते हैं। ऐसे में अधीनस्थ अधिकारियों को खुली छूट रहती है। साहब तो राजा आदमी हैं, जो काम न कर सिर्फ मौज करते हैं और उनके नीचे के भ्रष्ट अधिकारी असली राज करते हैं। जबकि उनके कार्यकाल में कर्तव्यनिष्ठ अधीनस्थ अधिकारियों को काम करने का मौका ही नहीं मिल पाता क्योंकि ‘राजा साहब’ चापलूस व भ्रष्ट अधीनस्थों से घिरे रहते हैं।

मैं उन सब लोगों को लेकर वापस थाने में आया जो चाय की दुकान पर इकट्ठा थे और एक-एक कर उन सभी की समस्याएं सुनीं। अस्सी प्रतिशत मामले तो मामूली बातों पर सामने आए छोटे-छोटे आपसी झगड़ों के थे, जिनका निपटारा दोनों पक्षों की बातों को ध्यानपूर्वक व धैर्यपूर्वक सुनकर वहीं पर किया गया। ऐसे सभी लोग थाना-परिसर में समझौता हो जाने के कारण खुशी-खुशी अपने घर चले गए। उनकी खुशी और कृतज्ञता को देखकर मुझे अच्छा लगा।

जब मैं थाने से वापस लौट रहा था तो जिज्ञासावश मैंने अपने हमराही पुलिस के सिपाही से उनके खुश होने का कारण पूछा। उसने मुझे बताया कि थाने का इंसपेक्टर दलाल के माध्यम से लोगों के मन में समस्या का खौफ पैदा करता था और फिर उन्हें सुलझाने का नाटक करके लोगों से मोटी रकम ऐंठता था। सिपाही ने बताया कि उसका तरीका कुछ इस तरह से होता था कि पहले एक पार्टी की शिकायत ली, उस शिकायत के आधार पर दूसरी पार्टी को थाने में उठाकर ले आए, फिर दूसरी पार्टी से पहली पार्टी के खिलाफ़ शिकायत ली, उसके आधार पर पहले वालों को भी उठा लाये और दोनों पार्टियों को जब छः-आठ घण्टे थाने में बैठा दिया जाता था, थक-हार कर उनको अपनी नादानी समझ में आ जाती थी और फिर दोनों पार्टियों का दलालों के माध्यम से समझौता कराकर व पैसा लेकर छोड़ दिया जाता था।

अगले कुछ दिनों में मुझे यह भी समझ में आया कि चाय की दुकान पर भीड़ को रोकने वाले थाने के दलाल ही होते थे। थाने की अपनी कार्यप्रणाली ऐसी होती थी कि आम आदमी थाने में सीधे घुसने की हिम्मत ही नहीं करता था। पहले तो संतरी को देखकर ही उसे डर लगने लगता था और फिर उसके बोलने के लहजे से तो उसकी रही-सही हिम्मत भी जवाब दे जाती थी। इसके ऊपर थाने के मुंशी की डाँट-डपट। पीड़ित व्यक्ति जब उन्हें किसी अपराध की सूचना देने जाता था तो उनसे इतने सवाल पूछे जाते थे कि पीड़ित पक्ष को लगता था कि जैसे उसने खुद ही अपराध कर डाला हो। इसीलिए लोग दलालों के बिना थाने के अन्दर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे।

उस दिन लोगों की समस्याओं की मुझे जो जानकारी मिली, उनमें दो मामले ऐसे भी थे, जो थाने पर बैठकर दोनों पक्षों को सुनकर नहीं निपट पाए। दोनों पक्ष खुद को सच्चा व दूसरे को झूठा बता रहे थे। इसलिए मैंने मौका-मुआयना करने का निर्णय लिया। दोनों मामलों से जुड़ी पार्टियों को अगले दिन मैंने सुबह थाने आने का समय दिया और दोनों पार्टियों को अपनी जीप में बैठाकर हमराह स्टाफ के साथ दोनों घटनाओं के मौके पर गया। एक मामला आँगन को लेकर विवाद का था। दोनों पक्ष उसे अपना बता रहे थे। मौके पर जाकर हमने दोनों पार्टियों के नक्शे देखे और आस-पास के लोगों से पूछा तो स्पष्ट था कि वह एक आदमी के कब्जे में लम्बे समय से चला आ रहा था और दूसरी पार्टी जबरदस्ती उसे कब्जाने का प्रयास कर रही थी।

कब्जा चाहने वाली पार्टी ने दलालों और प्रभावशाली लोगों के माध्यम से थाने में अपनी पकड़ बनाई हुई थी। मौके पर प्रस्तुत नक्शे व पूछताछ से यह स्पष्ट हो गया कि दूसरी पार्टी थाने से दबाव बनाकर जबरदस्ती उस आँगन पर अनधिकृत कब्जा करना चाह रही थी। मौका-मुआयना की वजह से कस्बे के लोगों के सामने दबंग पार्टी की पोल खुल गई थी। उसे भीड़ के सामने शर्मिन्दा होना पड़ा और स्वीकार करना पड़ा कि उसका दावा झूठा था। फूलपुर कस्बे के सीधे- सरल लोगों को पहली बार लगा कि पुलिस उनके घर पर आकर भी न्याय कर सकती है। यह उनके लिए एक नई बात थी। कुछ लोगों के साथ बातें करते हुए मैंने पाया कि उन्हें लगभग ऐसी अनुभूति हो रही थी कि मानो वे पुलिस व्यवस्था पर अपने खोये हुए विश्वास पर पुनर्विचार कर रहे हों।

दूसरे प्रकरण में मौके का निरीक्षण करने पर शिकायतकर्ता द्वारा बताया गया कि एक पक्ष द्वारा दूसरे के घर की दीवार तोड़ दी गई थी। मौके पर देखने पर पाया गया कि दीवार पूरी तरह क्षतिग्रस्त थी। जमीन का नक्शा देखने और आस-पास के लोगों से पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि पहले वहाँ कोई दीवार थी ही नहीं, कुछ ही दिनों पहले थाने की मदद से वहाँ पर दीवार खड़ी की गई थी। जिस व्यक्ति ने वहाँ पर दीवार खड़ी की थी, जमीन उसी की थी, उसी के द्वारा यह भी शिकायत की गई कि दूसरी पार्टी ने थाने के प्रभाव से दीवार को तोड़ दिया था। इस प्रकरण की जड़ तक जाने पर स्पष्ट हुआ कि पहले एक पार्टी द्वारा थाना-पुलिस को पैसा देकर दीवार बनवाई गई थी, फिर दूसरी पार्टी से पैसा लेकर पुलिस ने ही दीवार को तुड़वा दिया था। इस प्रकार दोनों पक्षों से पैसा लेकर दोनों पक्षों के बीच दुश्मनी की आग और लड़ाई-झगड़े को हवा दी गई थी। मैंने मौके पर ही ग्राम प्रधान और गाँव के संभ्रान्त लोगों को बुलाकर दोनों पक्षों के मध्य सर्वमान्य समझौते की पेशकश की जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।

इन दोनों घटनाओं के बारे में मैंने तत्काल एस.एस.पी. को भी अवगत कराया। एस.एस.पी. द्वारा प्रकरण की गम्भीरता को देखते हुए हल्का-प्रभारी को निलम्बित कर दिया गया व इंसपेक्टर को लाइन हाजिर कर दिया गया। इस घटना के बाद पूरे थाना क्षेत्रा में यह बात फैल गई कि पुलिस द्वारा स्वयं मौके पर जाकर तत्काल समस्याओं का निस्तारण कर दिया जाता है। इस कार्यवाही से एक अच्छी बात यह हुई कि गलत शिकायतों को लेकर लोगों का थाने में आना बन्द हो गया और थाने में दलालों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबन्धित कर दिया गया।

अब मुझे यह बात समझ में आयी कि इलाहाबाद पुलिस कार्यालय में करीब दो सौ लोग क्यों रोज शिकायत लेकर इकट्ठा हो जाते हैं। इस तरह के कुछ लोग हर थाने से जुड़े होते हैं, जिनको पैसे वालों या प्रभावशाली व्यक्तियों की थाने पर पकड़ के कारण थाना स्तर पर न्याय नहीं मिल पाता। कुछ लोगों को पुलिस कार्यालय जाने से भी न्याय नहीं मिल पाता है तो वह कोर्ट कचहरी के चक्कर काटते रहते हैं। स्पष्ट था कि यदि थाना स्तर पर अच्छी पुलिसिंग हो जाय तो सीधे-सादे ग्रामीणों को दर-दर की ठोकरें न खानी पड़ें। उनकी समस्याओं को सुनकर तत्काल निपटाने से या पुलिस के प्रभाव से मौके पर ही समझौता करा देने से गाँव में अमन शांति बनाये रखी जा सकती है।

इसके बाद मैंने अपना ध्यान थाना क्षेत्रा में होने वाले छोटे-छोटे अपराधों पर दिया। अपराधियों की पूरी सूची बनाकर बारी-बारी से प्रत्येक गाँव के रजिस्टर न0-8 को लेकर दिन में ही हर एक अपराधी के घर पर पुलिस टीम को लेकर गया। रजिस्टर न0-8 थाने पर रखा जाने वाला प्रत्येक गांव का ऐसा रजिस्टर होता है जिसमें उस गाँव का पूरा ब्यौरा रहता है सम्भ्रान्त लोगों का भी और अपराधियों का भी। इसका क्षेत्र में बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ा क्योंकि प्रो-एक्टिव पुलिसिंग का यह सबसे महत्वपूर्ण कदम है। यदि हम अपराधियों को चिन्ह्ति कर उनका पीछा करेंगे तो अपराधियों को यह मालूम रहेगा कि पुलिस की हम पर नजर है। ऐसी कार्यवाही से अपराधी क्षेत्र छोड़ कर भाग जाते हैं। प्रो-एक्टिव पुलिसिंग में पुलिस पहले से ही अपराधियों को चिह्नित कर उनका पीछा करती है तथा उनके खिलाफ़ कार्यवाही करती है, इससे अपराधों में कमी आ जाती है। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो सक्रिय अपराधी अपराध करते रहते हैं और पुलिस उनके पीछे दौड़ती रहती है।

इसी कड़ी में कुछ ऐसे लोगों के खिलाफ गुण्डा एक्ट की कार्यवाही की गई, जो अपने मोहल्ले या इलाके में छोटी-छोटी बातों में मारपीट करते थे या महिलाओं से छेड़खानी करते थे। इस तरह के लोगों को कहीं पर ‘दादा’, कहीं पर ‘गुण्डा’ व कहीं पर ‘भाई’ कहा जाता है। स्थानीय स्तर पर ऐसे उचक्कों का आतंक इस कदर होता है कि लोग इनकी शिकायत करने से कतराते हैं। लोग सोचते हैं कि प्रभावशाली लोगों के दबाव में इनका तो कुछ बिगड़ेगा नहीं, व्यर्थ में कीचड़ में पत्थर फैंकने से वे लोग ही परेशान होंगे। लोगों को यह भी भरोसा नहीं होता कि थाने द्वारा उनकी शिकायत पर उन उचक्कों के विरुद्ध कार्यवाही की जाएगी। उनकी यह धारणा काफी हद तक सच भी है। मैंने ऐसे लोगों को चिन्हित कर उनके विरुद्ध गुण्डा एक्ट के अन्तर्गत जिला बदर करने हेतु कार्यवाही प्रारम्भ की। पंद्रह दिन में ही परिणाम सामने थे। अब लोगों का पुलिस पर विश्वास बढ़ गया था और उनके मन से थाने पर आने का डर समाप्त हो गया था। आम लोगों में चर्चा थी कि कोई भी व्यक्ति अपनी समस्या लेकर बिना किसी रोक-टोक एवं बिना दलाल के थाने पर जा सकता है। गाँव एवं मौहल्लों के जिन अपराधियों के विरूद्व कार्यवाही की गई थी, उससे भी लोगों के मन में अपराधियों का डर खत्म हुआ और वे आगे आकर खुलकर अपने मौहल्ले के छोटे-बड़े सभी प्रकार के अपराधियों के सम्बन्ध में सूचना देने लगे।

कुल मिलाकर थाने पर हर किसी की समस्या ध्यान से सुनकर उसका विधिक निराकरण करने से लोगों में पुलिस की विश्वसनीयता बढ़ी थी। आम आदमी की पहुँच अधिकारी तक थी और उनकी शिकायतों पर तत्काल कार्यवाही होती थी। इस कार्यवाही के बाद मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि यदि पुलिस आसानी से हर किसी को उपलब्ध हो, अपनी संवेदनशीलता बनाए रखे, आम आदमी को पुलिस तक जाने में डर न लगे और पुलिस उनकी समस्याओं को सुनकर निष्पक्ष कार्यवाही करे तो निःसंदेह लोगों के मन में पुलिस के प्रति विश्वास जगेगा और उनके मन में यह धारणा मजबूत होगी कि पुलिस मूलतः उन्हीं लोगों की मदद के लिए बनी है।

फूलपुर की ट्रेनिंग से पहले कभी-कभी मुझे लगता था कि कहीं मैं अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में तो नहीं फँस गया हूँ, जहाँ सारे रास्ते आपस में उलझ गए हैं और मेरे पास बाहर निकलने का कोई रास्ता ही नहीं है... ‘अर्द्धसत्य’ फिल्म के नायक की तरह कहीं कुंठा तो मुझे नहीं घेर लेगी? कहीं मुझे सारी जिंदगी एक घुटन भरे माहौल में तो नहीं बितानी पड़ेगी? मुझे लगता था कि मैं एक चैराहे पर खड़ा कर दिया गया हूँ और कुछ लोग मेरे पाँवों को अपने क्रूर पंजों से दबोचे मुझे घेरे हुए हैं। ये सब मेरे परिचित चेहरे हैं... कुछ तो मेरे ही विभाग के हैं, कुछ समाज के संभ्रांत विशिष्ट लोग हैं और कुछ लोग अपने कंधों पर रुपयों से भरी भारी थैलियाँ लिए हैं। लेकिन फूलपुर के अनुभव के बाद मुझे विश्वास हो गया कि यदि मामले की तह तक जाकर, इंसानियत के नजरिये से सोचते हुए संवेदनशील मन से एवं निष्पक्ष भाव से अच्छे लोगों के प्रति मित्रवत व बदमाशों के प्रति कठोरता से व्यवहार कर, पुलिस और जनता के बीच समन्वय स्थापित कर पुलिसिंग की जाय तो जटिल से जटिल चक्रव्यूह को भेदना और उससे बाहर निकलना मुश्किल नहीं है।

(अशोक कुमार)

6 टिप्‍पणियां:

  1. पुलिस में आप जैसी सोच वाले लोगों की तादाद बढ़े , आम जनता आसानी से थाने में शिकायत दर्ज करा सके और पुलिस के प्रति सदभावना उत्पन्न हो , उम्मीद करता हूं

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  2. आपका लेख अमर उजाला में भी पढ़ा था ... आप उत्तराखंड को अपनी सेवाएं दे रहे हैं ...आपको यहाँ देखकर खुशी हुई.. ब्लॉग बहुत शातिशाली माध्यम है ....आप अपने अमूल्य विचारों से हमें अवगत करते रहिये ...

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  3. पुलिस और जनता के बीच सॉप और लाठी की छवि दिखाई देती है, भारतीय पुलिस अग्रे‍जो की पुलिस की छवि से न‍िकल नही पायी है और जनता के अंदर से वह डर भी नही गया है।

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  4. आपका संस्मरण बहुत अच्छा लगा आप जैसे लोग पोलिस मे हों तो शायद भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराईयों पर काबू पाया जा सकता है। मेरा सेल्यूट स्वीकार करें।एक नागरिक के नाते और आशीर्वाद एक माँ जैसी होने के नाते।

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  5. मेरे ही गांव में एक डकैती के मामले में एक शख्स को इसलिये बार बार बुलाया जाता था क्योंकि जब उसके यहां डकैती हुई तो उसने डकैतों का मुकाबला किया था, इस चक्कर में उसकी नाक पर भी चोट लग गई।

    चूंकि यह शख्स डकैतों से आमना सामना करने के कारण उन्हें पहचान लेने की अतिरिक्त योग्यता पा गया था, सो पुलिस जब चाहे तब किसी उचक्के को पकडे जाने पर उसकी पहचान परेड में इस शख्स को जरूर बुलवाती और पूछती कि बताओ कि कहीं यही तो वह डकैत नहीं है.....काम छोड कर बार बार बुलाये जाने से तंग आकर इस शख्स नें खुद ही उपाय निकाला......एक को पहचान लिये जाने का दावा किया और जब कहा गया कि आप अपने बारे में कुछ और बतायें ....तो इसी क्रम मे इस शख्स ने अपनी उम्र अपने पिता से ज्यादा बता दी। सभी भौंचक....अगले सवाल पर भी वही सब उटपटांग जानकारीयां.....सो पुलिस ने भी उसे पागल मान बख्श दिया। और दुबारा कभी पहचान परेड के लिये नहीं बुलाया।

    बहादुर के बदले पागल के नाम से बुलाया जाना इस शख्स ने कबूल कर लिया। यह शायद उनकी नियती थी। अब तो वह जिवित भी नहीं है....बस उनके इस शरारत भरे पागलपन को लोग कभी कभार अब भी याद करते हैं।

    पोस्ट में संस्मरण तो अच्छा है ही, बात की तह तक जाने की आपकी खूबी अच्छी लगी। अच्छी पोस्ट।

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  6. संस्मरण से ही जाहिर है .....कि हमारी व्यवस्था ही उन्ही को प्रश्रय दे रही है जिन्हें उस व्यवस्था द्वारा सुधारा जाना चाहिए !!



    प्राइमरी का मास्टर द्वारा हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका स्वागत !!

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