समर्पित

इन्सानियत की सेवा करने वाले खाकी पहने पुलिस कर्मियों को जिनके साथ कार्य कर मैं इस पुस्तक को लिख पाया और
माँ को, जिन्होंने मुझे जिन्दगी की शुरुआत से ही असहाय लोगों की सहायता करने की सीख दी

रविवार, 10 जनवरी 2010

वोट न देने की सजा बलात्कार…???

लीक से हटकर इंसाफ की एक डगर

उत्तर प्रदेश का शाहजहाँपुर जिला कई विशेषताओं के लिए जाना जाता है। एक ओर उत्तर में घने जंगलों से घिरा हुआ, अतीत में दलदल के रूप में प्रसिद्ध, तराई का क्षेत्र है, जिसे मेहनतकश सिख किसानों ने अपने खून-पसीने से सींच कर स्‍वर्ग बना डाला है। दूसरी ओर दक्षिण में रामगंगा की कटरी है, जो कलुआ जैसे कुख्‍यात डकैतों के गिरोहों एवं खूंखार अपराधियों की शरण-स्‍थली रही है। यदि इस बात की गहराई में जाया जाए कि इस क्षेत्र में इतने अपराधी क्‍यों पैदा होते हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं गाँव के लोगों द्वारा छोटी-छोटी बातों को लेकर की जाने वाली लड़ाइयाँ, जाति और वर्णगत संघर्ष तथा गाँव में फैली सामन्‍तशाही जिम्‍मेदार है। इन्‍हीं बातों ने गाँव की नौजवान पीढ़ी के बीच एक घुटन भरा माहौल पैदा कर दिया है जो उन्‍हें गाँव छोड़कर भागने के लिए मजबूर करता रहा है। जो नौजवान गाँव या आसपास के इलाकों में ठहरे रह जाते हैं, उनमें से कुछ डकैत और कुख्‍यात अपराधियों के जाल में फँसकर खुद भी उनके पदचिद्दों पर चलने लगते हैं।

एक और बात जो शाहजहाँपुर के बारे में सबसे अधिक ध्‍यान आकृष्‍ट करती है, वह है यहाँ के लोगों का शस्‍त्र-प्रेम। जब भी आप सड़कों से गुजरते हैं, दर्जनों लोग बन्‍दूकें लिए, कई तरह के वाहनों पर सवार आते-जाते दिखाई देते हैं। इस सबके बावजूद उल्‍लेखनीय बात यह है कि यहाँ के निवासी संभ्रान्‍त, मृदुभाषी एवं सुसंस्‍कृत हैं।

एक और बात जो शाहजहाँपुर के बारे में सबसे अधिक ध्‍यान आकृष्‍ट करती है, वह है यहाँ के लोगों का शस्‍त्र-प्रेम।

देश की आजादी की लड़ाई में भी शाहजहाँपुर का अपना विशिष्‍ट स्‍थान रहा है। यहाँ का हर नागरिक अपनी मिट्‌टी में पले-बढ़े दो महान शहीदों, अशफ़ाक़ उल्‍ला और रामप्रसाद बिस्‍मिल द्वारा आजादी की लड़ाई में निभाई गई क्रांतिकारी भूमिका को याद कर खुद को गौरवान्‍वित महसूस करता है।

वर्ष 1997 में, जब मैं शाहजहाँपुर में पुलिस अधीक्षक के रूप में तैनात था, हर रोज कार्यालय में मुझसे मिलने सैकड़ों शिकायतकर्ता आते थे। अलग-अलग तरह के मामलों को लेकर की गई ये शिकायतें रोचक और चौंकाने वाली तो होती ही थीं, कभी-कभी दिल दहला देने वाली भी होती थीं। इन शिकायतों को सुनना और फिर उनका कानूनी एवं मानवीय धरातल पर विवेचन कर समाधान निकालना अपने-आप में एक नए अनुभव से गुजरना होता था।

इसी क्रम में एक दिन साधारण-सी दिखने वाली लगभग 25 वर्षीय एक महिला मेरे कार्यालय में आयी। वह एक साधारण पीले रंग की सूती साड़ी पहने हुई थी और किसी गरीब कारीगर परिवार से संबंधित लगती थी। मैंने अनुभव किया कि उसका पहनावा, उसकी चाल-ढाल और उसका चेहरा ऐसा गरिमामय था कि ऐसा संभव ही नहीं था कि सामने वाले को अपनी उपस्‍थिति का अहसास न कराए। उसकी पीड़ा उसके चेहरे से साफ झलक रही थी। वह अत्‍यधिक थकी हुई लग रही थी और ऐसा लगता था कि मुझसे मिलने के लिए बहुत दूर से आयी है तथा मिलने के लिए उसे काफी देर तक इन्‍तज़ार करना पड़ा है।

‘‘साहब, मैं बहुत विपदा की मारी हूँ । क्‍या आप मुझे सिर्फ पाँच मिनट देकर मेरी पूरी बात सुन सकते हैं ?'' कमरे में घुसते ही उस महिला ने सीध्‍ो मुझे संबोधित करते हुए विनती की। सीधी-सपाट भाषा और उन शब्‍दों के पीछे झलकते उसके दृढ़ निश्‍चय को देखकर एकाएक मैं चौंका। जहाँ एक ओर मुझे आश्‍चर्य हुआ वहीं दूसरी ओर मेरे अन्‍दर कौतूहल के साथ उस महिला के प्रति एक अमूर्त-से सम्‍मान का भाव भी उत्‍पन्‍न हुआ। मन में जिज्ञासा उठी कि गाँव की एक सीधी-सादी महिला अकेले अपने आत्‍मबल, आत्‍मविश्‍वास एवं दृढ़ निश्‍चय के सहारे अपनी समस्‍या को लेकर इतनी दूर चलकर न जाने कितनी कठिनाईयों से जूझती हुई मेरे कार्यालय तक आयी होगी । सामान्‍यतः देखा गया है कि ग्रामीण अंचल में रहने वाला एक आम आदमी बिना किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति को साथ लिए, पुलिस के अदने से कर्मचारी के सामने आने में भी डरता है, जबकि यहाँ तो एक ग्रामीण महिला अपने जिले के पुलिस कप्‍तान के सामने निर्भीकता के साथ खड़ी अपनी समस्‍या का सहज ढंग से बखान कर रही थी।

‘‘साहब, मैं बहुत विपदा की मारी हूँ । क्‍या आप मुझे सिर्फ पाँच मिनट देकर मेरी पूरी बात सुन सकते हैं ?''

अनुभव ने मुझे सिखाया है कि समस्‍या की तह तक जाने के लिए हर आदमी की बात ध्‍यान से मानवीय संवेदनाओं के साथ सुनना और सारी बात सुनने के बाद शिकायतकर्ता के दृष्‍टिकोण से उस पर मनन करना बहुत जरूरी है। तभी हम उसकी समस्‍या की गहराई और उसके उन अपेक्षित आयामों तक पहुँच सकते हैं जिनकी ओर शिकायतकर्ता ध्‍यान आकर्षित करना चाहता है। शायद तभी हम ऐसी कारगर पुलिस व्‍यवस्‍था बना सकते हैं, जो गरीबों, उपेक्षितों और पीड़ितों की मदद करने के साथ ही उनकी पहुँच के दायरे में हो। सामान्‍यतः देखा गया है कि वर्तमान व्‍यवस्‍था में जिनके पास पैसा है, ताकत है उनको तो न्‍याय मिल जाता है और बाकी लोग या तो परिस्‍थितिवश उससे वंचित रह जाते हैं या न्‍याय के नजदीक पहुँच कर भी उसे हासिल कर पाने में समर्थ नहीं हो पाते। जब तक वे न्‍याय के निकट पहुँचते हैं, उनका समर्थ प्रतिद्वंद्वी अपने साधनों और पहुँच की बदौलत, उनसे पहले न्‍याय को लपक लेता है। अपने अनुभवों से मैंने जाना है कि अच्‍छी पुलिस व्‍यवस्‍था की अगर किसी को जरूरत है तो ऐसे लोगों को, जो न तो किसी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति की कृपा के पात्रा हैं और न ही जिनके पास खर्च कर सकने के लिए पैसा है।

मैंने उस महिला को बैठाया और आराम से पूरा समय लेकर अपनी परेशानी बताने को कहा। ज्‍यों-ज्‍यों वह महिला अपने संयत, मगर विश्‍वास भरे स्‍वर में दिल दहला देने वाली अपनी आपबीती घटना मेरे सामने बयान कर रही थी, उस महिला के प्रति मेरा सम्‍मान और अधिक बढ़ता चला जा रहा था। उसकी अभिव्‍यक्‍ति में एक ओर बला की ताकत थी तो दूसरी ओर व्‍यवस्‍था के प्रति उसका अटूट विश्‍वास भी झलक रहा था। वह न्‍याय पाने की आशा में कई अड़चनों का मजबूती से सामना करती हुई मेरे पास आई थी, शायद इसीलिए उसकी अभिव्‍यक्‍ति में इस तरह की स्‍पष्‍टता थी। अबला समझी जाने वाली एक सामान्‍य घरेलू औरत के साथ घटित इस घटनाक्रम को सुनकर मैं मंत्रमुग्‍ध-सा उसकी बातों में डूबता चला गया। इस बीच कितना समय बीत गया, मुझे इसका आभास तक नहीं रहा।

उसने जो आपबीती सुनाई, उसके अनुसार इस महिला के गाँव में पंचायत के चुनाव होने वाले थे। चुनाव प्रचार के दौरान सभी उम्‍मीदवार धनबल एवं बाहुबल का खुलकर इस्‍तेमाल कर रहे थे। कहीं पैसा काम आ रहा था तो कहीं शराब और कहीं पर दबंगों की टोली... ये सारे हथकण्‍डे चुनाव के लिए अपनाये जा रहे थे। इसी दौरान कुछ दबंग लोग महिला के घर पर आए और उन्‍होंने उस महिला से अपने परिवार के सारे सदस्‍यों के साथ उन्‍हें ही वोट डालने को कहा। जाते-जाते वे यह चेतावनी देना भी नहीं भूले कि उन्‍हें वोट न देने की स्‍थिति में उसके परिवार को गम्‍भीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए।

पंचायत के चुनाव समाप्‍त हो गए और जब चुनाव के नतीजे सामने आए तो वही दबंग महाशय अपनी दबंगई और पैसे के बल पर ग्राम प्रधान के रूप में चुन लिए गए। परन्‍तु उनकी जीत बहुत ही कम वोटों से हुई थी, इसलिए उन लोगों ने यह पता लगाना शुरू किया कि किन-किन लोगों ने उनको वोट नहीं डाले। हमारे प्रजातंत्र में वोट की गोपनीयता होते हुए भी यह पता लगाना बहुत आसान है कि किस क्षेत्र से किन लोगों ने किसे वोट दिया है। उस महिला के मामले में भी यही हुआ और दबंगों को यह शक हो गया कि महिला और उसका परिवार दबंगों को वोट न देने वालों में शामिल था।

हमारे प्रजातंत्र में वोट की गोपनीयता होते हुए भी यह पता लगाना बहुत आसान है कि किस क्षेत्र से किन लोगों ने किसे वोट दिया है।

चुनाव सम्‍पन्‍न हुए बहुत दिन नहीं बीते थे कि एक दिन दबंगों के परिवार के चार लोग हाथ में लाठी-डंडे लिए महिला के घर आए और बिना किसी से पूछे या वाद-विवाद के महिला के घर में घुसते चले गए। दबंगों ने झटके से दरवाजा अन्‍दर से बन्‍द कर दिया। महिला के पति और ससुर को उन्‍होंने बुरी तरह पीटा और फिर उन्‍हें रस्‍सी से बाँधकर उनके सामने ही एक-एक करके चारों दबंगों ने बलपूर्वक उसकी इज्‍जत लूटी। महिला चीखती- चिल्‍लाती रह गई, उसका पति और ससुर इस घिनौने कृत्‍य तथा अमानवीय अत्‍याचार को बेबस व असहाय मूकदर्शक की तरह देखते रहे। महिला की चीख-पुकार बंद दीवारों के बाहर भी गई लेकिन किसी भी व्‍यक्‍ति ने अंदर आकर विरोध करने का साहस नहीं दिखाया। पूरे समय दबंग अपनी मनमानी करते रहे। चीखती-चिल्‍लाती महिला और उसके परिजनों को उसी प्रकार अस्‍त-व्‍यस्‍त हालत में छोड़कर जाते-जाते चारों लोग महिला के परिवार को धमकी भी दे गए कि उनकी खिलाफत करने का अंजाम उन्‍होंने देख ही लिया है, अब अगर पुलिस में रिपोर्ट करने की हिम्‍मत दिखाई तो उसके परिणाम इससे भी अधिक भयावह होंगे।

गाँव भर में दंबगों ने सरेआम ढिंढोरा पीटा कि उनके साथ बगावत करने का क्‍या हश्र होता है। उन्‍होंने घूम-घूमकर महिला के साथ किए गए व्‍यभिचार का नमक-मिर्च लगाकर वर्णन किया और बार-बार इस बात का बखान किया कि उन्‍होंने किस तरह उनके गाँव की बहू की इज्‍जत लूटकर अपना बदला लिया। जाहिर है कि दबंगों के द्वारा गाँव वालों को अप्रत्‍यक्ष रूप में यह संदेश दिया गया कि अगर कोई भी उनकी तरफ आँख उठाने या बोलने की हिम्‍मत करेगा तो उसका भी यही परिणाम होगा।

दबंगों के जाने के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह लुट और टूट चुकी महिला इंसाफ पाने की उम्‍मीद में पुलिस में रिपोर्ट लिखाना चाहती थी लेकिन उसके पति और ससुर दबंगों के डर से इतने भयाक्रान्‍त थे कि वे रिपोर्ट लिखवाने के लिए राजी नहीं हुए। महिला के परिजनों को प्रशासन पर विश्‍वास नहीं था। वे बार-बार यही दोहरा रहे थे कि उनकी किस्‍मत में ऐसा ही लिखा था। ऐसे दबंगों के खिलाफ किसी प्रकार की रिपोर्ट लिखवाने से भी प्रशासन उनके खिलाफ़ कुछ करेगा तो नहीं बल्‍कि उनके परिवार के लिए और बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाएगी। महिला काफी दिनों तक मानसिक तनाव और पशोपेश में रही किन्‍तु अंततः अपने परिजनों की बात न मानकर उसने अपना रास्‍ता खुद चुनने का निर्णय लिया। अपने पति की बेबसी व लाचारी को देखते हुए उसने मन ही मन यह ठाना कि वह स्‍वयं न्‍याय के लिये लड़ेगी और दंबगों को सबक सिखा कर रहेगी, जिससे वे किसी और असहाय महिला के साथ ऐसा करने की हिम्‍मत न कर सकें। अपने साथ हुए अन्‍याय व अपमान के विरु़द्ध न्‍याय पाने की दृढ़ इच्‍छाशक्‍ति ने ही उसे थाने जाकर स्‍वयं रिपोर्ट लिखवाने के लिए प्रेरित किया। वह अकेले ही थाने में रिपोर्ट लिखवाने के लिए पहुँची।

गाँव में पुलिस आयी और उसने अपनी तहकीकात प्रारम्‍भ की। मामला एकदम खुला था। महिला, उसके परिजन एवं गाँव वालों के सामने घटना के तत्‍काल बाद स्‍वयं ही दबंगों ने घटना को उजागर किया था। बलात्‍कार जैसे इस जघन्‍य अपराध के आरोपियों को अन्‍ततः पुलिस के द्वारा गिरफ्‍तार कर लिया गया। परन्‍तु हमारी व्‍यवस्‍था की त्रासदी ये है कि प्रभावशाली एवं पैसे वाले लोग आपराधिक न्‍याय व्‍यवस्‍था में खामियाँ ढूँढकर जघन्‍यतम अपराध करके भी कानूनी दाँव-पेंच में माहिर वकीलों से पैरवी करवा कर जमानत पर छूटने में सफल हो जाते हैं। इस मामले में भी यही हुआ और पूरे साक्ष्‍यों के बावजूद अपराधी जमानत पर छूटने में सफल हो गए।

जेल से बाहर आकर ये अपराधी और अधिक मुक्‍त ढंग से घूमने लगे और उनके द्वारा फिर से पीड़ित परिवार से बदला लेने की घोषणा पूरे गाँव में की जाने लगी। जिस औरत ने उन्‍हें जेल भिजवाया था, उसे तो अब किसी हाल में नहीं छोड़ा जाएगा, उसके परिवार के एक-एक सदस्‍य को वे जेल भिजवा कर रहेंगे।... उन्‍होंने थाने के अपनी जाति के ही एक दरोगा से सम्‍पर्क कर महिला के पति को नशीली दवाओं का धंधा करने के आरोप में गिरफ्‍तार करवा दिया। एक दिन महिला का पति जब अपने किसी काम से साइकिल पर शहर तक गया था तो उसकी साइकिल की सीट के नीचे एक चरस का पैकेट रखवा दिया गया और फिर उसकी सूचना पुलिस को देकर साइकिल की तलाशी करवाई गई। चरस रखने के आरोप में उसके पति को जेल भेज दिया गया। दबंगों द्वारा पूरे गाँव में फिर से ढिंढोरा पीट-पीट कर बताया गया कि उनके द्वारा अपना बदला किस प्रकार पूरा किया गया।

महिला और उसके बूढे़ ससुर का गाँव में जीना मुश्‍किल हो गया था क्‍योंकि मजदूरी करके परिवार का भरण-पोषण करने वाला उनका एकमात्र सहारा जेल भेज दिया गया था। जमानत कराने के लिए परिवार के पास वकील की फीस देने तक को पैसे नहीं थे, बचाव का कोई रास्‍ता बचा नहीं था। उस पर महिला को हमेशा यह डर सताता रहता था कि न जाने कब दबंग उनके घर पर आ धमकें और उसके साथ फिर जाने कैसी ज्‍यादती करें। इस बीच उसके पति को जेल में 45 दिन बीत चुके थे। वह और उसका बूढ़ा ससुर भुखमरी के कगार पर पहुँच चुके थे और उन्‍हें अन्‍धकार के सिवाय कोई रास्‍ता नहीं दिखाई दे रहा था। ऐसे में जब उसने सुना कि जिले के नए कप्‍तान साहब आम लोगों की बातें, बिना किसी सिफारिश के, सीध्‍ो सुन लेते हैं, तो उसने न्‍याय की आशा में मेरे पास सीध्‍ो आने का निर्णय लिया। शायद यही उसकी आखिरी उम्‍मीद भी थी। उसने बताया कि यद्यपि उसे शुरू में घबराहट हुई लेकिन इसके बावजूद अपने सम्‍मान व जीवन की रक्षा के लिए उसके पास इसके अलावा कोई विकल्‍प नहीं था। अंततः यहाँ तक आने का साहस उसने जुटा ही लिया।

महिला की दुःखभरी कहानी सुनकर मैं सन्‍न रह गया। जिस पुलिस व्‍यवस्‍था को गरीबों और असहायों का सहारा बनना चाहिए, वही इस परिवार के लिए अभिशाप बनकर आयी थी। जिस पुलिस व्‍यवस्‍था को प्रभावशाली व्‍यक्‍तियों, दबंगों और बदमाशों को गरीबों पर ज्‍यादतियों के लिए सजा दिलानी चाहिए थी, उसी व्‍यवस्‍था का इस्‍तेमाल कर ऐसे शरारती तत्‍वों ने एक गरीब, निर्दोष व असहाय व्‍यक्‍ति को नारकोटिक्‍स जैसे कठोर एक्‍ट के झूठे इल्‍जाम में जेल भिजवा दिया था।

इतना कुछ बीत जाने के बाद ज्‍यादातर लोग थक-हार कर जिन्‍दगी से लड़ना छोड़ देते हैं, आत्‍महत्‍या कर बैठते हैं या फिर कुछ लोग फूलन देवी जैसा असामाजिक रास्‍ता अपनाने को मजबूर हो जाते हैं। किन्‍तु इस महिला की न्‍याय पाने की ललक और व्‍यवस्‍था में उसकी आस्‍था अतुलनीय थी, जिसकी वजह से उसने दबंगों के विरुद्ध संघर्ष जारी रखने का निर्णय लिया। अन्‍याय के विरुद्ध उसने अपनी लड़ाई जारी रखी। मुझे महिला के इसी साहस ने प्रभावित किया। वह मेरे सामने अपनी आपबीती सुनाकर शान्‍त बैठी थी और मेरी प्रतिक्रिया का इन्‍तजा़र कर रही थी। मुझे उसके प्रति पूरी सहानुभूति थी... मैं उसकी पीड़ा और व्‍यथा को पूरी तरह समझ सकता था। मैंने उसे आश्‍वस्‍त किया कि इस मामले की निष्‍पक्ष जाँच कराई जाएगी और यदि उसका पति झूठे मुकदमे में जेल भेजा गया है तो उसे जल्‍द ही जेल से छुड़वा दिया जाएगा।

मेरे द्वारा समझाए जाने पर क्षेत्राधिकारी ने अपनी जाँच आख्‍या दुबारा भेजी। इस बार जाँच आख्‍या पूर्णतः सही थी।

उस औरत ने जिस आत्‍मविश्‍वास के साथ अपनी आपबीती सुनाई थी, उसका एक-एक शब्‍द सच प्रतीत हो रहा था। मैंने अपने स्‍टाफ़ को बुलाकर महिला का प्रार्थनापत्र लिखवाया। हालांकि प्रार्थनापत्र लिखते हुए महिला को एक बार फिर अपनी दुखद त्रासदी से गुजरना पड़ा, फिर भी जिस उत्‍साह से उसने अपनी शिकायत दर्ज करवायी उससे साफ झलक रहा था कि मुझसे मिलकर उसके मन में न्‍याय पाने की आशा जगी थी। मैंने उसकी शिकायत की एक प्रति उस क्षेत्र के सर्किल ऑफिसर को जाँच हेतु भेज दी और साथ ही एक कॉपी गोपनीय जाँच हेतु स्‍थानीय अभिसूचना इकाई को भी प्रेषित कर दी।

अन्‍य राजकीय विभागों की तरह ही पुलिस विभाग में शिकायतों के निस्‍तारण की जो व्‍यवस्‍था है, उसका सबसे दुखद और आश्‍चर्यजनक पहलू यह है कि सामान्‍यतः जिस आदमी के विरुद्ध शिकायत होती है, अन्‍ततः उसी व्‍यक्‍ति को जाँच अधिकारी बना दिया जाता है। इस केस में भी क्षेत्राधिकारी ने इस शिकायत को जाँच हेतु थानाध्‍यक्ष के सुपुर्द कर दिया और थानाध्‍यक्ष ने उसी उपनिरीक्षक को जाँच सौंप दी जिसके विरुद्ध वह शिकायत की गई थी। स्‍वाभाविक था कि दरोगा ने अपनी कार्यवाही को सही ठहराते हुए फाइल में रिपोर्ट लगा दी, जो थानाध्‍यक्ष और क्षेत्राधिकारी के माध्‍यम से मेरे कार्यालय में पहुँच गई।

प्रायः यह देखने में आया है कि कुछ अधिकारी जन-समस्‍याओं के प्रति संवेदनशील नहीं होते, उनकी पकड़ में इस तरह की बातें नहीं आ पाती हैं। इस तरह की जाँच-आख्‍याओं को ‘सीन, फाइल' नोट लगाकर हमेशा के लिए बंद समझ लिया जाता है और पूरी त्रासदी फाइलों के ढेर में दब कर रह जाती है। मुझे लगा कि ऐसी स्‍थिति में मेरे पुलिस में बने रहने का कोई औचित्‍य नहीं रह जाता। यदि मैंने भी इस केस पर विशेष ध्‍यान नहीं दिया होता तो यह शिकायत भी ऐसे ही फाइलों के ढेर में दब कर दम तोड़ जाती। इससे भी बड़ी विडंबना यह होती कि फाइलों के साथ ही साथ महिला और उसके परिवार की तीन जिन्‍दगियॉँ भी दफन हो चुकी होतीं।

तत्‍काल कुछ भी निर्णय न ले सकने की स्‍थिति में मैंने वह फाइल अपनी मेज पर ही रख छोड़ी। गोपनीय शाखा को जाँच के लिए मैंने जो टिप्‍पणी प्रेषित की थी, उसकी रिपोर्ट भी तीन दिन के अन्‍दर मेरे कार्यालय पहुँच गई। रिपोर्ट में महिला की आपबीती को सभी अत्‍याचारों सहित अक्षरशः सच पाया गया था। आश्‍चर्यजनक बात यह थी कि यह घटना किसी से भी छिपी हुई नहीं थी। गाँव का बच्‍चा-बच्‍चा शुरू से लेकर अन्‍त तक पूरी कहानी को जानता था। जैसे कि पहले भी बताया जा चुका है, दबंगों ने खुद ही महिला के पति को झूठे मुकदमें में फँसाने का ढिंढोरा जमकर पीटा था।

गोपनीय शाखा की जाँच प्राप्‍त होने पर मैंने सम्‍बन्‍धित क्षेत्राधिकारी को अपने कार्यालय में बुलाया और उसको गोपनीय शाखा की जाँच-आख्‍या दिखायी। वह एक अनुभवी क्षेत्राधिकारी था, जो दरोगा से प्रोन्‍नत होकर पुलिस उपाधीक्षक बना था तथा काफी उम्रदराज़ भी था। उसने तत्‍काल इस बात को मान लिया कि महिला की शिकायत सही थी। किन्‍तु उसकी हिचक थी कि हम लोग कैसे अपने ही स्‍टाफ़ के लोगों को गलत ठहरा सकते हैं। उसका यह भी कहना था कि अब तो केस न्‍यायालय में जा चुका है। ऐसे में अपने स्‍टाफ की गलती को स्‍वीकार कर लेने से स्‍टाफ़ को दण्‍डित तो करना ही पड़ेगा, साथ ही ऐसा करने से पुलिस की छवि भी धूमिल होगी। क्षेत्राधिकारी ने अपनी पूरी ज़िन्‍दगी इसी तरह बिताई थी, इसीलिए उसके अनुसार इस केस को रफा-दफा करने में ही बुद्धिमानी थी।

लेकिन मैंने मन बना लिया था कि मैं हर हालत में सत्‍य और न्‍याय का साथ दूंगा और पुलिस की एक गलती को छिपाने के लिए उससे भी बड़ी दूसरी गलती नहीं करूंगा। यहाँ तीन-तीन लोगों की ज़िन्‍दगी का ही नहीं, लोगों के पुलिस-तंत्र में विश्‍वास का सवाल था। मेरा मानना था कि पीड़ित महिला और उसके परिवार को बचाने में यदि पुलिस की गलती उजागर होती भी है तब भी हम न्‍याय के ज्‍यादा निकट होंगे। ऐसा करने से पुलिस की छवि खराब होने के बजाय और बेहतर होगी क्‍योंकि गलती को स्‍वीकार करने के लिए और अधिक ताकतवर होने की आवश्‍यकता होती है। मीडिया और समाज भी इस बात को समझेगा कि कम से कम किसी स्‍तर पर तो पुलिस से न्‍याय की उम्‍मीद की जा सकती है।

मेरे द्वारा समझाए जाने पर क्षेत्राधिकारी ने अपनी जाँच आख्‍या दुबारा भेजी। इस बार जाँच आख्‍या पूर्णतः सही थी। उसके आधार पर मैंने सम्‍बन्‍धित उप-निरीक्षक को निलम्‍बित कर दिया, जिसकी वजह से एक अबला का परिवार नष्‍ट होने के कगार पर पहुँच गया था । मैंने क्षेत्राधिकारी को आदेश दिया कि वह न्‍यायालय में सच्‍चाई को स्‍वीकारते हुए महिला के पति के खिलाफ़ दर्ज केस को वापस लेने हेतु आख्‍या भेजे। यह भी निर्देश दिये कि यह स्‍वीकार किया जाय कि प्रकरण में पुलिस से गलती हुई है। माननीय न्‍यायालय द्वारा इस रिपोर्ट के आधार पर महिला के पति को बाइज्‍जत छोड़ दिया गया। हमने दबंगों के ऊपर कड़ी कार्यवाही सुनिश्‍चित की ताकि भविष्‍य में वे किसी निर्दोष को फिर से अपने जुल्‍मों का शिकार न बना सकें।

अपने पति के जेल से छूटने के बाद महिला अपने पति के साथ मेरे कार्यालय में मुझे धन्‍यवाद देने आई तो उसके चेहरे पर आभार एवं खुशी के मिश्रित भाव साफ देखे जा सकते थे। उसको मिले न्‍याय से उसे अब जीने का मजबूत सहारा मिल गया था। मैं जानता था कि हमारी कार्यवाही से उस महिला के दुख को कम तो नहीं किया जा सकता था किन्‍तु उसके घावों पर मरहम लगाने का काम तो हमारे निर्णय ने किया ही। इसके अलावा महिला और उसके परिवार को सम्‍मानपूर्वक एवं भयमुक्‍त जीवन जीने का अवसर भी मिला।

अगले दिन क्षेत्राधिकारी भी मेरे कार्यालय में आए और उन्‍होंने स्‍वीकार किया कि पुलिस की कहानी पलटने से, पुलिस द्वारा अपनी गलती स्‍वीकार करने से, निर्दोष आदमी के जेल से छूटने से और दोषी पुलिसकर्मियों के सजा पाने से समाज और मीडिया में पुलिस की छवि बेहतर हुई। न्‍याय के प्रति लोगों का विश्‍वास बढ़ा और लोगों को खाकी वर्दी में छिपी हुई इंसानियत के दर्शन हुए।

(अशोक कुमार)

* * *

4 टिप्‍पणियां:

  1. लेकिन मैंने मन बना लिया था कि मैं हर हालत में सत्‍य और न्‍याय का साथ दूंगा और पुलिस की एक गलती को छिपाने के लिए उससे भी बड़ी दूसरी गलती नहीं करूंगा। ........................... ऐसा करने से पुलिस की छवि खराब होने के बजाय और बेहतर होगी क्‍योंकि गलती को स्‍वीकार करने के लिए और अधिक ताकतवर होने की आवश्‍यकता होती है। ...........

    This is the attitude, other force member should also learn/ follow .......

    I appreciate your efforts

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  2. लीक को तोड़ कर इस तरह काम करने वाले पुलिस अधिकारी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। लेकिन वे ही पुलिस की छवि को स्वच्छ बना सकते हैं। पुलिस को यदि राजनीतिक प्रभावों से मुक्त किया जा सके और अन्वेषण के लिए अलग ही महकमा कायम हो तो क्या फर्क पड़ सकता है? कभी इस पर भी विचार रखें।

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  3. .... बेहद प्रभावशाली व प्रसंशनीय ब्लाग !!!

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  4. आज जब चारो तरफ पुलिस पर अनेक तरह के आरोप लग रहे हैं, चाहे वह भ्रष्टाचार का मामला हो या फिर मानव अधिकारों के हनन का, ऐसे समय में अशोक कुमार जी ने जहाँ न्याय पाने की उम्मीद से बंचित लोंगो में आशा की किरण पैदा की है वहीँ अपने विभाग को भी आइना दिखया है साथ ही यह साबित किया है की खाकी हमेशा जनता के साथ है
    कमरुद्दीन सिद्दीकी, अध्यक्ष अंतरराष्ट्रिय मानव अधिकार सुरक्षा परिषद्

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