समर्पित

इन्सानियत की सेवा करने वाले खाकी पहने पुलिस कर्मियों को जिनके साथ कार्य कर मैं इस पुस्तक को लिख पाया और
माँ को, जिन्होंने मुझे जिन्दगी की शुरुआत से ही असहाय लोगों की सहायता करने की सीख दी

शनिवार, 2 जनवरी 2010

पंचों ने सुनाया राक्षसी फरमान…

 

‘‘जुम्‍मन शेख के मन में सरपंच का उच्‍च स्‍थान ग्रहण करते ही अपनी जिम्‍मेदारी का भाव पैदा हुआ । सोचा-मैं इस वक्‍त न्‍याय और धर्म के सर्वोच्‍च आसन पर बैठा हूँ । पंचों की जुबान से जो बात निकलती है-वह खुदा की तरफ से निकलती है । देवों की वाणी में मेरे अपने मनोविकारों का कदापि समावेश नहीं होना चाहिए । मेरा सच से जौ भर भी टलना उचित नहीं ।''

(प्रेमचन्‍द की कहानी ‘पंच परमेश्‍वर' से)

पंच परमेश्‍वर या ...

रुड़की हरिद्वार जनपद में स्‍थित एक महत्‍वपूर्ण शहर है। यहाँ करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले देश का पहला इंजीनियरिंग कॉलेज ‘थॉमसन कालेज आफ इंजीनियरिंग' के रूप में स्‍थापित किया गया था जो बाद में रुड़की इंजीनियरिंग विश्‍वविद्यालय के नाम से प्रसिद्ध हुआ एवं वर्तमान में आई.आई.टी. में परिवर्तित हो चुका है। यह शहर गंगनहर के किनारे बसा हुआ है। यहॉँ नहरों के निर्माण में कर्नल कोटले की इंजीनियरिंग का उत्‍कृष्‍ट नमूना देखने को मिलता है। रुड़की के चारों तरफ देहात का क्षेत्र है। इस क्षेत्र की संस्कृति और लोक परम्पराएँ हरिद्वार की अपेक्षा सीमावर्ती जनपदों मुजफ्‍फरनगर और सहारनपुर से ज्‍यादा मिलती हैं।

वर्ष 1996 में रुड़की के इसी देहात क्षेत्र में एक ऐसी घटना घटित हुई, जिसने पूरी मानव जाति का और हमारी सदियों पुरानी न्‍याय-परम्‍परा का सिर शर्म से झुका दिया। यह एक बीस साल के मजदूर और उसकी पत्‍नी के साथ घटित लोमहर्षक, शर्मनाक और क्रूर घटना की कहानी है, जिसमें पंचायत ने न्‍याय के नाम पर एक गरीब महिला के साथ घोर अन्‍याय कर डाला था और उसकी मदद को गाँव का कोई भी व्‍यक्‍ति सामने नहीं आया था।

एक दिन जब मैं हरिद्वार स्‍थित एस.एस.पी. ऑफिस में बैठा काम कर रहा था तो एक थानाध्‍यक्ष का फोन आया। वह बहुत ही डरी हुई आवाज़ में बोल रहा था। उसने बताया कि मजदूर किस्‍म का एक आदमी पास के गाँव से एक बैलगाड़ी से चलकर आया है। बैलगाड़ी में एक टूटी-सी चारपाई पर उसकी पत्‍नी लगभग अचेतावस्‍था में पड़ी है और बिल्‍कुल भी हिलने-डुलने व बोलने की स्‍थिति में नहीं है। थानाध्‍यक्ष ने बताया कि शिकायतकर्ता बता रहा है कि गाँव के ही 15-16 लोगों ने उसकी पत्‍नी के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया है।

घटना सचमुच ही अत्‍यन्‍त अमानवीय व रोंगटे खड़े कर देने वाली थी, परन्‍तु थानाध्‍यक्ष को डरने के बजाय तत्‍काल कार्यवाही करने की जरूरत थी। मैंने फोन पर ही महिला को तत्‍काल अस्‍पताल पहुँचाने के निर्देश दिए और स्‍वयं भी अस्‍पताल होते हुए घटनास्‍थल के लिए चल पड़ा। रुड़की हरिद्वार से लगभग 30 कि.मी. दूर है। जब तक मैं रुड़की पहुँचा तब तक महिला को चिकित्‍सकीय सहायता दी जाने लगी थी। मैने गौर से उस महिला को देखा, वह टक-टकी बाँधे भाव शून्‍य होकर अपने बिस्‍तर पर पड़ी हुई थी व किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं कर रही थी। डॉक्‍टर ने मुझे बताया कि महिला गम्‍भीर मानसिक आघात की स्‍थिति में है, इसीलिए वह बोल नहीं पा रही है। शारीरिक रूप से भी उसमें बैठने, उठने या चलने की क्षमता नहीं बची है। परन्‍तु उसकी जान को खतरा नहीं था।

मेरे अस्‍पताल पहुँच जाने के बाद चिकित्‍सकीय सहायता में तेजी आई और पीड़ित महिला को अच्‍छे स्‍तर की दवाइयाँ और इंजेक्‍शन उपलब्‍ध कराये जाने लगे। डॉक्‍टर से मैंने इस महिला को एक प्राइवेट वार्ड तत्‍काल उपलब्‍ध कराने को कहा क्‍योंकि मुझे लगा कि जनरल वार्ड में इतनी शर्मनाक घटना की बार-बार चर्चा होने से उसे व उसके पति को और अधिक दुःख और मानसिक आघात पहुँचेगा।

उसका पति बीस-बाइस साल का एक दुबला-पतला मजदूर लगता था, जो फटे-पुराने एवं मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए था। उससे पूछताछ करने पर मुझे पता चला कि वह और उसकी पत्‍नी गाँव के पास के एक ईंट के भट्‌ठे में मजदूरी का काम करते थे। ठेकेदार के मुंशी की उसकी पत्‍नी पर बुरी नजर थी और धीरे-धीरे उसने उसको पैसे और ऐशोआराम के लालच में अपने जाल में फँसा लिया था। जब से उसकी शादी हुई थी, यह महिला दिन भर ईंट-पत्‍थर ढोने का काम करती थी। शादी के रंगीन सपने उसके लिए मात्रा सपने बन कर रह गए थे क्‍योंकि दस-बारह घण्‍टे की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद पति-पत्‍नी दोनों घर में आकर निढाल होकर पड़ जाते थे और उनमें वैवाहिक जीवन का सुख भोगने की शक्‍ति या इच्‍छा ही नहीं बची रहती थी। महिला को तो परिवार का खाना आदि भी बनाना पड़ता था। मुंशी द्वारा दिखाये जा रहे ऐशो-आराम के सपनों में इस महिला को अपने इन सब दुखों का छुटकारा नजर आता था। अन्‍ततः एक दिन यह महिला अपने पति-धर्म को ठोकर मारकर ठेकेदार के मुंशी के साथ उसकी मोटर साइकिल पर भाग गई।

इस मजदूर ने ठेकेदार से बात कर अपनी पत्‍नी को ढुँढवाने में मदद की गुजारिश की तो ठेकेदार ने उसे मदद का आश्‍वासन दिया। ठेकेदार के आश्‍वासन के बावजूद मजदूर स्‍वयं साइकिल ले कर अपनी पत्‍नी को ढूँढने के लिए इधर से उधर दौड़ता रहा। अन्‍ततः एक महीने बाद उसने अपनी पत्‍नी को खोज ही निकाला। इस एक महीने में उसकी पत्‍नी के मुंशी के साथ ऐशो-आराम के सपने चकनाचूर हो चुके थे। मुंशी का अपना परिवार था, जिस पर भी उसे खर्च करना पड़ता था। इस नवयुवती महिला को मुंशी ने अपनी रखैल बना छोड़ा था। जब उसका मन होता तो उसके पास आ जाता बाकी समय अपने परिवार में ही बिताता था । धीरे-धीरे मुन्‍शी ने उसे पैसा व जरूरत की चीजें देना भी बन्‍द कर दिया था । महिला को हमेशा समाज से छुप कर रहना पड़ता था । ऐसे बन्‍दी जीवन से तो उसे अपनी ईंट-पत्‍थर की मजदूरी की जिन्‍दगी ज्‍यादा अच्‍छी लगने लगी थी और उसे रह-रह कर अपने पति की याद सताने लगी थी।

आखिरकार एक महीने बाद ठेकेदार के दबाव से मुंशी ने उसकी पत्‍नी उसे वापस कर दी। गरीबी के मारे मजदूर ने इस घटना को अपने दुर्भाग्‍य के रूप में स्‍वीकार कर लिया। पैसे वाले और प्रभावशाली लोगों से मजदूर को उसकी पत्‍नी वापस मिल गई थी, यही उसके लिए बहुत था। वह अपनी पत्‍नी को पाकर खुश था और उसके साथ खुशी-खुशी अपना जीवन बिताना चाहता था। उसमें न तो कोई बदला लेने की क्षमता थी और न ही उसकी ऐसी भावना थी।

वह अपनी पत्‍नी को लेकर लगभग शाम के वक्‍त अपने गाँव पहुँचा तो खबर पूरे गाँव में आग की तरह फैल गई। ग्रामीण जीवन की एक खास बात यह है कि व्‍यक्‍ति का अपना निजी कुछ भी नहीं होता। व्‍यक्‍ति के साथ घटित हर घटना और घटना से जुड़े पहलुओं के बारे में हर किसी को सब कुछ मालूम होता है। व्‍यक्‍ति की अपनी निजी ज़िन्‍दगी वहाँ न के बराबर होती है। इस घटना के बारे में पता चलते ही मामले पर विचार करने के लिए गाँव में रहने वाले उसकी जाति के तथाकथित मान-मर्यादा के ठेकेदारों ने आनन-फानन में एक पंचायत बुलायी।

UnjustJudge2 शुरू से ही यह पति-पत्‍नी पंचायत के सामने एक कोने में दुबके बैठे थे। महिला के भागने से लेकर वापस आने तक की पूरी कहानी उसके पति ने पंचायत को सुनाई। फिर पंचायत में बड़े-बुजुर्गों और समाज के नैतिकता के ठेकेदारों ने महिला के भागने की परिस्‍थितियों पर विचार किया। पूरी सुनवाई और विचार-विमर्श के बाद पंच-परमेश्‍वर ने महिला को ही दोषी ठहराया। पंचायत का कहना था कि यह महिला दूसरी जाति के व्‍यक्‍ति के साथ भाग गई थी। उसे भागना ही था तो उनकी जाति के लोगों में मर्दों की कमी नहीं थी। उन्‍हें यह अपनी बिरादरी की मर्दानगी का अपमान लगा। पंचायत ने न तो ठेकेदार और औरत भगाने वाले की अमीरी और मजदूर की गरीबी की परिस्‍थितियों पर कोई ध्‍यान दिया और न ही इनके भविष्‍य में चैन की जिन्‍दगी जीने की इच्‍छा की ही परवाह की। पंचायत का निर्णय था कि चूंकि उस औरत ने दूसरी जाति के आदमी के साथ भागकर पूरी जाति की इज्‍जत व सम्‍मान को मिट्‌टी में मिला दिया था, अतः गाँव के उसी जाति के सभी पुरुष इस महिला से बदला लेंगे और उस औरत को अपनी मर्दानगी का प्रमाण देगें। पंचायत द्वारा इस महिला को दोषी ठहराया गया था पर आश्‍चर्यजनक बात यह थी कि दोषी को अपना पक्ष रखने के लिए एक भी शब्‍द बोलने का अवसर नहीं दिया गया था।

पंचायत के निर्णय के बाद उसकी जाति के लोगों में अपना पौरुष सिद्ध करने की होड़-सी लग गई। मजदूर का एक कच्‍चा खपरैल का घर था और उसी कोठरी के एक कोने में टूटी-फूटी चारपाई पर महिला के साथ जाति के ठेकदारों ने एक-एक कर सामूहिक बलात्‍कार किया। बेचारी व बेबस महिला के शरीर के साथ खिलवाड़ होता रहा, उसकी इज्‍जत तार-तार होती रही परन्‍तु उसमें न तो विरोध की शक्‍ति थी और न ही वह विरोध करने के लिए सक्षम थी। उसका असहाय पति भी दरवाजे के बाहर खड़ा रहा और एक-एक करके सोलह लोगों को अन्‍दर जाते और आते देखता रहा। यह कुकृत्‍य रात के लगभग नौ बजे शुरू हुआ था और आधी रात तक महिला के बेहोश होने के बाद ही रुक पाया। यह सारी हैवानियत तब रुकी जब उसकी बेहोशी से लोग डर गए कि कहीं महिला मर तो नहीं गई। विडम्‍बना यह थी कि गाँव के किसी भी बड़े-बूढ़े ने इसका विरोध नहीं किया। पूरे गाँव की जानकारी में इतना जघन्‍य अपराध होता रहा परन्‍तु किसी ने भी न तो इसे रोकने की कोशिश की और न ही पुलिस में जाकर मामले की रिपोर्ट करने की कोशिश की।

प्रातः होने पर यह मजदूर किसी की बैलगाड़ी उधार माँगकर, अपनी पत्‍नी को उसी टूटी-फूटी चारपाई सहित, जिसमें कि महिला के साथ बलात्‍कार हुआ था, बैलगाड़ी में डालकर थाने पर ले आया और घटना की सूचना थानाध्‍यक्ष को दी। महिला के पति से यह सब जानकारी प्राप्‍त कर मुझे जातीय पंचायतों के इस तरह के शर्मनाक फैसले पर अत्‍यन्‍त अफसोस हुआ और गुस्‍सा भी आया। मैं अस्‍पताल से तत्‍काल थानाध्‍यक्ष के साथ घटनास्‍थल के लिए चल पड़ा।

गाँव में पहुँचकर मैंने उस मजदूर की कच्‍ची कोठरी व इस जघन्‍य अपराध के घटनास्‍थल को देखा। यह घर गाँव के एक कोने में स्‍थित था। बीच में एक बड़ा-सा कच्‍चा आँगन था और उसके चारों ओर छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी थीं। उन्‍हीं में से एक कोठरी उस मजदूर की थी। इसी बीच के आँगन में यह पंचायत हुई थी, जिसमें यह शर्मनाक, अमानवीय और पाशविक फैसला सुनाया गया था। मौके पर हुई पूछताछ व तफ्‍तीश से पूरी घटना स्‍पष्‍ट हो चुकी थी। जैसा कि पीड़ित महिला के पति ने बताया था, यह शर्मनाक घटना वैसे ही वहीं पर घटी थी।

मैंने पीड़ित महिला के साथ बलात्‍कार करने वाले सभी सोलह लोगों की गिरफ्‍तारी के आदेश दिए। इन लोगों के अतिरिक्‍त मैंने पंचायत में फैसला सुनाने वाले सभी पंचों को भी गिरफ्‍तार करने के आदेश दिये, क्‍योंकि ये सब इस जघन्‍य अपराध में सह-अपराधी थे। थानाध्‍यक्ष ने मुझे समझाने की कोशिश की कि ऐसा करने से क्षेत्रा के जाति-विशेष के सारे लोग नाराज हो जाएँगे, और थाना क्षेत्रा में शांति व्‍यवस्‍था बनाए रखना मुश्‍किल हो जाएगा। इसके बावजूद मेरे आदेश स्‍पष्‍ट थे। जाति की झूठी मान-मर्यादा के नाम पर पंचायत ने पूरी मानवता को शर्मसार एवं कलंकित कर डाला था। यह कैसे पंच परमेश्‍वर थे जिनका दिल इतने अमानवीय, पाशविक एवं पूरी नारी जाति को बेइज्‍जत करने वाले आपराधिक फैसले को करते वक्‍त भी नहीं पसीजा! इस तानाशाही फैसले के आगे तो द्रौपदी का चीर हरण भी फीका पड़ जाएगा। ऐसे पंच-राक्षसों को यदि छोटी-छोटी बातों से डर कर सजा नहीं दी गई तो समाज में जाति के नाम पर इस तरह के जघन्‍य अपराध भविष्‍य में होते रहेंगे। इसलिए गिरफ्‍तारी तत्‍काल की जानी आवश्‍यक थी।

थानाध्‍यक्ष की यह भी सोच थी कि इसको जाति-विशेष के लोगों से कुछ मुआवजा दिला दिया जाए और मामले को रफा-दफा कर दिया जाय। तब मेरी समझ में आया कि थानाध्‍यक्ष शुरू में सूचना देते वक्‍त क्‍यों डरा हुआ था। हमारी व्‍यवस्‍था की त्राासदी यह है कि व्‍यवस्‍था के संचालन के लिए जो लोग जिम्‍मेदार हैं उन्‍होंने मामले पर कभी भी सही दृष्‍टिकोण से विचार नहीं किया और खुद को बचाने के चक्‍कर में इस तरह के मामले को दबाने में ही यकीन किया है। यह मानकर कि उसके क्षेत्रा में इतना जघन्‍य अपराध कैसे हो गया, थानाध्‍यक्ष के विरुद्ध निलम्‍बन की कार्यवाही न हो जाय, इसलिए वह डरा हुआ था। इस तरह के अपराध में थानाध्‍यक्ष क्‍या कर सकता था? यह उसके सक्रिय होने से रुकने वाले अपराधों में से नहीं था, यह तो एक प्रकार का सामाजिक अपराध था, जो लोगों की संकुचित दृष्‍टि और गन्‍दी मानसिकता का परिणाम था। जाति के सम्‍मान के नाम पर एक महिला के साथ इतना बड़ा घृणित कार्य कर डाला गया था। मैंने अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए थानाध्‍यक्ष को तत्‍काल पूरी कार्यवाही करने के निर्देश दिए। मैंने उसे यह भी आश्‍वासन दिया कि उसके विरुद्ध कुछ नहीं होने वाला था बल्‍कि यदि उसने घटना को दबाने का प्रयास किया होता तो उसके विरुद्ध निश्‍चित रूप से कार्यवाही होती।

मेरे आश्‍वासन के बाद थानाध्‍यक्ष ने जोश और हौसला दिखाया व सभी अपराधी और उनका साथ देने वाले पंचायत के सदस्‍यों को गिरफ्‍तार कर जेल भेजा गया और उनके विरुद्ध न्‍यायालय में मुकदमा चलाने हेतु चार्ज- शीट न्‍यायालय भेज दी गई।

यह घटना कितनी बड़ी और सनसनीखेज थी, इसका अन्‍दाजा मुझे अगले दिन अखबारों में छपे समाचारों से मिला। अगले दिन इस घटना को सभी क्षेत्राीय व राष्‍ट्रीय अखबारों द्वारा प्रथम पृष्‍ठ पर प्रमुखता से छापा गया था। तीसरे दिन राष्‍ट्रीय महिला आयोग भी पूछताछ हेतु रुड़की आया। मीडिया और महिला आयोग द्वारा घटना पर दुख प्रकट किया गया किन्‍तु पुलिस के कार्य की सराहना की गई।

थानाध्‍यक्ष को अब जाकर मेरी बात समझ में आई कि यदि उसने घटना को छिपाने या दबाने का प्रयास किया होता तो वह भी एक प्रकार का अपराध कर रहा होता और खाकी को इंसानियत की मदद न करने पर दागदार होना पड़ता। पीड़ित को न्‍याय न दिलवाना भी तो आखिर एक अपराध है!

* * *

(अशोक कुमार)

4 टिप्‍पणियां:

  1. अशोक जी सब से पहले तो आप के साहस और कर्तव्यपरायणता को सलाम!
    एक और तो पढ़ कर ही शर्म से सिर झुकने लगता है कि हम किस तरह के समाज में जी रहे हैं। दूसरी और आप जैसे पुलिस अधिकारियों को देख कर गर्व भी होता है।
    आप को नववर्ष की शुभकामनाएँ! नया वर्ष आप के लिए नई खुशियाँ लाए।

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  2. इस तरह की खबरें देख अंदर तक सिहरन सी हो जाती है कि कैसे एक महिला को इतनी प्रताडना देने का फरमान पंचायत ने सुनाया होगा।
    लानत है ऐसी पंचायतों पर। यह घटना तो आपके संज्ञान में आ गई लेकिन दूर दराज में न जाने कितनी ऐसी घटनाएं घट जाती हैं जिनका कि कहीं जिक्र तक नहीं होता।
    पोस्ट के जरिये अपनी बात सबके सामने रखने का शुक्रिया। अक्सर इस तरह की बातें अंदरखाने में या तो दबा दी जाती हैं या फिर उस मानसिकता में गुम हो जाती हैं कि - हुई थी एक घटना।
    ब्लॉगिंग का एक आयाम यह भी है कि बात बोलने लगती है।

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  3. व्‍यवस्‍था के संचालन के लिए जो लोग जिम्‍मेदार हैं उन्‍होंने मामले पर कभी भी सही दृष्‍टिकोण से विचार नहीं किया और खुद को बचाने के चक्‍कर में इस तरह के मामले को दबाने में ही यकीन किया है।
    सही बात है. दुर्भाग्य से सरकारी नौकरियों में कर्मियों के चयन में बुराई से लड़ने की इच्छाशक्ति और साहस का परीक्षण नहीं होता है. विशेषकर पुलिसकर्मियों के चयन और प्रशिक्षण में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है. उस थानाध्यक्ष को समझाने के लिए आपको बधाई!

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  4. very embarassing story.In present era I could not beleive that this type of incident can take place.

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